Bikaner News
जहां सरकारी इमारतें खुद जानलेवा खतरा बन जाएं और जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठे रहें, वहां तंत्र की संवेदनहीनता अपने चरम पर पहुंच चुकी होती है।

बीकानेर मेडिकल कॉलेज की ढही हुई इमारत न सिर्फ एक हादसा है, बल्कि पूरे सिस्टम की बदहाली का आईना भी है। 7 जुलाई को कॉलेज के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूम, आईटी सेल और सेकंड लैब का हिस्सा अचानक गिर पड़ा। संयोग अच्छा था कि कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन यही घटना अगर व्यस्त समय में होती, तो कितनी बड़ी त्रासदी होती, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। हैरानी की बात यह है कि पांच दिन बीत जाने के बाद भी मलबा वहीं पड़ा है और कॉलेज कैंपस के ठीक बाहर रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही जारी है।
सामाजिक कार्यकर्ता आदर्श शर्मा का कहना है, “यह लापरवाही नहीं, एक तरह का प्रशासनिक अपराध है। जर्जर इमारतों का समय पर ऑडिट और मरम्मत नहीं कर पाना, सीधे तौर पर नागरिकों की जान जोखिम में डालना है।”

मेडिकल कॉलेज की घटना कोई अलग मामला नहीं है। बीकानेर की शायद ही कोई गली, सड़क या नाली ऐसी हो जो जर्जर या अव्यवस्थित न हो। बरसात आते ही करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद शहर जलभराव का शिकार हो जाता है, और समाधान के नाम पर पानी सूरसागर में डालना पड़ता है।


फील्ड विजिट जीरो, कागज़ी तैयारी सौ प्रतिशत — यही हाल है अफसरशाही का। वातानुकूलित कमरों से योजनाएं बनती हैं, लेकिन ज़मीनी हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।














