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पीबीएम अस्पताल में भगवान नहीं गुस्सा मिला, दर्द से तड़पते मरीज पर डॉक्टर का कहर…

🔴 Bikaner PBM Hospital News

बीकानेर संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीबीएम एक बार फिर इलाज नहीं, बल्कि विवाद और अव्यवस्था को लेकर सुर्खियों में है। बीती रात ट्रोमा सेंटर में जो कुछ हुआ, उसने अस्पताल की कार्यप्रणाली, डॉक्टरों के व्यवहार और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार गांव देराजसर से आई महिला भीखी देवी अपने बेटे श्यामलाल को सीने में तेज दर्द होने पर ट्रोमा सेंटर लेकर पहुंची। पीड़ा असहनीय होने पर महिला ने ड्यूटी डॉक्टर से जल्द उपचार शुरू करने की गुहार लगाई। आरोप है कि, इसी दौरान डॉक्टर आपा खो बैठे और मरीज के साथ अभद्र व्यवहार किया गया। परिजनों का कहना है कि डॉक्टर ने युवक के बाल पकड़कर मारपीट का प्रयास किया। घटना के बाद ट्रोमा सेंटर में हंगामा, शोर-शराबा और अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा में तैनात गार्ड बीच-बचाव करते नजर आए, लेकिन स्थिति काफी देर तक नियंत्रण में नहीं आ सकी। इस पूरे घटनाक्रम से वहां मौजूद अन्य मरीज और उनके परिजन भयभीत और परेशान होते रहे।

क्या मरीज का दर्द अपराध है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मरीज दर्द से बेहाल होकर डॉक्टर का ध्यान आकर्षित करता है, तो क्या यह अपराध की श्रेणी में आता है? ग्रामीण और अनपढ़ मरीजों के लिए डॉक्टर आज भी भगवान समान होते हैं। ऐसे में अगर वही डॉक्टर संयम खो दें, तो भरोसा टूटना स्वाभाविक है। नोबेल प्रोफेशन से जुड़े चिकित्सकों से संवेदनशीलता, धैर्य और मानवीय व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। लेकिन पीबीएम में बार-बार सामने आ रही घटनाएं इस सोच को कमजोर करती नजर आ रही हैं।

करोड़ों की सुरक्षा व्यवस्था फिर भी नाकाम

पीबीएम अस्पताल में हर साल सुरक्षा गार्ड, सीसीटीवी कैमरे और अन्य इंतजामों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, इसके बावजूद विवाद के समय व्यवस्था पूरी तरह फेल नजर आती है। सवाल यह भी है कि जब ट्रोमा सेंटर के भीतर इतना बड़ा हंगामा चलता रहा, तो अधीक्षक या कोई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर क्यों नहीं पहुंचा?

विवादों का अखाड़ा बनता पीबीएम

बीते कुछ महीनों में पीबीएम अस्पताल इलाज से ज्यादा विवादों के कारण चर्चा में रहा है।

  • गलत खून चढ़ाने का मामला
  • भर्ती में लापरवाही
  • डॉक्टरों और मरीजों के बीच लगातार टकराव
  • अस्पताल में दवाइयां का स्टॉक होने के बावजूद मरीज के परिजनों से दवाइयां बाहर से मंगवाना।

इन सभी मामलों में पीबीएम प्रशासनिक के दावे एकदम खोखले साबित हुए हैं।

क्या पीबीएम को अब सख्त प्रशासनिक मॉनिटरिंग की जरूरत है?

जनप्रतिनिधियों और आमजन की मांग है कि पीबीएम जैसे संवेदनशील संस्थान पर किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की नियमित मॉनिटरिंग हो। लोगों का मानना है कि जब तक सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। गौरतलब है कि कुछ समय पहले संभागीय आयुक्त विश्राम मीणा द्वारा अधीक्षक को “कमजोर कड़ी” बताया गया था। मौजूदा हालात उस बयान को सही साबित करते नजर आ रहे हैं।

सरकारी अस्पताल गरीब और मजबूर मरीजों की आखिरी उम्मीद होते हैं। अगर वहीं उन्हें अपमान, डर और मारपीट का सामना करना पड़े, तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे बचेगा?

अब सवाल सिर्फ एक डॉक्टर या एक घटना का नहीं है, सवाल है पूरे सिस्टम की जवाबदेही का।क्या पीबीएम प्रशासन इस बार सिर्फ बयान देगा या वास्तव में कोई ठोस सुधार करेगा?


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