⚪ Anti Conversion Law India
सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर एक बार फिर गंभीर रुख दिखाया है। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है। अदालत ने साफ किया कि व्यक्तिगत आस्था और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े इस मुद्दे पर अब जल्द अंतिम निर्णय की दिशा में बढ़ा जाएगा।
पीठ ने यूपी, एमपी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, हरियाणा और झारखंड के समान कानूनों पर लंबित याचिकाओं को भी इस केस के साथ टैग करने के निर्देश दिए। इसका मतलब है कि अब सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होगी—जिससे पूरे देश के लिए एकीकृत कानूनी दृष्टिकोण सामने आ सकता है।
याचिका में क्या कहा गया?
- PUCL की याचिका में इन कानूनों को अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप वाला बताया गया है। याचिका के प्रमुख बिंदु:
- कानून व्यक्तिगत आस्था एवं धर्म परिवर्तन जैसे निजी निर्णयों पर अनुचित नियंत्रण थोपते हैं।
- इंटरफेथ यानी अंतर-धार्मिक संबंधों को अनुपातहीन रूप से अपराध की श्रेणी में लाते हैं।
- विवाह या धर्म परिवर्तन से पहले सरकारी अधिकारियों को नोटिस देने की बाध्यता निजता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
- पुलिस को अत्यधिक शक्तियां देकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर संकट खड़ा किया गया है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि विधायिका ने अपनी संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कानून बनाए हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के मानकों के अनुरूप नहीं हैं।















